गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008

इलेक्शन के बहाने इच

नमिता जोशी
सर्किट फटे बांस के माफिक गले से चक दे लालू गाने की ट्यून निकाल रयेला है। अपुन ने पूछा कि काइकू दो दिन से अपने गले के टॉन्सिल खराब कर रयेला है, तो बोला-मुन्ना भाई, रेल बजट नहीं देखा क्या! बोले तो यूपी-बिहार के भैया लोग कू मुंबई के भाई लोग ने कित्ती गाली दी, वाट लगाई, पन इस बिहारी बाबू लालू ने मुंबईकर के वास्ते एक नहीं, दो नहीं, पूरी तीन सौ लोकल रेल का गिफ्ट दे डाला।

तभीच उदर पके अमरूद के माफिक मालूम नहीं किदर से भांकर भाणा टपका और सर्किट के टेप पर स्टॉप का बटन लगाने का कोशिश किया। बोला-ये लालू की बाजीगरी तेरे जइसे फ्यूज सर्किट के भेजे में नहीं घुसने वाली। अपुन का नाम पब्लिक ने भांकर भाणा ऐसेइच नहीं रखा। बोले तो नई लोकल रेल लाने का क्या फायदा? पुरानी लोकल की हालत देखी है? बिना क्रीम के केक और बिना ब्रेड के सैंडविच के माफिक पटरी पर चल रयेली है। पहले उसकू ठीक करना मांगता था ना। तू देखना, ये तीन सौ लोकल तीन दिन में बरोबर हो जाएंगी।

भांकर भाणे की जली कटी सुनने के बाद सर्किट फुकेले बम के माफिक गुस्से में बोला - अक्खा मुंबई की पब्लिक हैपी है और तू उस खुशी में पानी डाल रयेला है। नई लोकल की बात सुनके गरीब लोग का कित्ता भला होगा, मालूम? सर्किट की इस बात पे भी भाणे ने फ्ल चला दिया। अपुन तो ये सोच के डर रयेला था कि कहीं ये बात राज ठाकरे सुन लेगा तो मालूम नहीं मुंबई में एक बार फिर कित्ता बड़ा बवाल खड़ा हो जाएंगा।

भाणा बोला - लालू ने खाली यूपी और बिहार की गरीब जनता का खयाल रखा है, महाराष्ट्र की नहीं। गरीब रथ सबसे जास्ती उदर इच से निकाला है। अब तू देखना, बिहार यूपी के भैया लोग कू फैलने से कोई नहीं रोक सकता। रेल बजट में बिहार और महाराष्ट्र कू काइकू सैंडविच बना रयेले हो! अपुन ने दोनों कू चुप कराया। अगर लड़ना इच है तो इस बात पे लड़ो कि लालू ने रेल की सेफ्टी और स्पीड बढ़ाने के वास्ते कुछ नहीं बोला। और वइसे भी वोट जुगाड़ करने के वास्ते भी तो सरकार कू कुछ करनाइच था ना।

इल्जाम लगाना इच है तो लालू पे ये इल्जाम लगाओ कि अगर इत्ते सारे भाड़े घटाने इच थे तो पिछले पांच साल में काइकू नहीं घटाए। इलेक्शन के टाइम पे कॉमन मैन की याद कइसे आ गई! वइसे जो भी हो, कॉमन मैन कू तो फायदा इच हुआ है ना, इलेक्शन के बहाने इच सही। कॉमन मैन की तो निकल पड़ी है।

रविवार, 24 फ़रवरी 2008

अपुन की मूंछों में ब्रेक थोड़ी लगे हैं!

नमिता जोशी
सर्किट फटेले टायर के माफिक मुंह लटका के खोली में एंटर किया। अपुन ने क्या हुआ पूछने के वास्ते मुंह खोला भी नहीं था कि वो पहले इच बताने लगा- मुन्ना भाई अपुन अभी रोड पे मस्त हाथी के माफिक घूम रयेला था। तभीच वो कल्लू कचरा छुट्टे सांड के माफिक अपनी नई साइकल पे आता हुआ दिखा। नई साइकल का ना उसकी आंखों में रे बैन के गॉगल के माफिक चढे़ला था। बस उसी ने अपनी साइकल अपुन पे चढ़ा दी। अपुन ने उससे बोला- रोड पे चलने वाले आदमी का नहीं तो कम से कम अपनी साइकल का तो सोच। पहले घंटी नहीं मार सकता था क्या! वो बोला- इत्ती बड़ी साइकल मार दी अपुन ने तेरेकू, छोटी सी घंटी मारके क्या होता?

सर्किट और साइकल की ट्रैजिडी सुनके हनीफ हटेला भी चालू हो गया। बोला- अरे, मुन्नाभाई ये तो कुछ भी नहीं है। कल अपुन का साइकल के साथ इससे भी सॉलिड एनकाउंटर हुआ था। बोले तो वो छोकरी साइकल सीख रयेली थी। अपुन जा रयेला था काम से। अचानक अपनी साइकल लेकर अपुन के पैर पे चढ़ गई। दिल में तो आया कि दो-तीन घूंसे पिन्हा दूं, पन लड़की समझ कू अपुन ने उसकू माफ कर दिया। गुस्से में इत्ता इच बोला कि तू अपुन के पैर कू साइकल स्टैंड समझेली है क्या, जो पार्किंग करने के वास्ते आंख बंद करके चढ़ा दी? वो छोकरी गुस्से में साइकल पकड़ के चली गई। पन अभी तो ये अपुन की एनकाउंटर स्टोरी का इंटरवल था।

शाम कू क्लाइमैक्स अइसे हुआ कि अपुन साइकल पे जा रयेला था कि मालूम नहीं वो किदर से अपुन के सामने आ गई। साइकल एकदम वोइच स्टाइल में उसके पैरों पे रुकी, जइसे सुबह उसने अपुन के पैरों पे चढ़ाई थी। एक सेकंड के वास्ते तो लगा गॉड ने अपुन कू उससे बदला लेने का गोल्डन चांस दे दिया। अचानक वो फुल वॉल्यूम में टीवी सीरियल की वैम्प के माफिक दहाड़ी - इत्ता बड़ा हो गया, इत्ती मोटी-मोटी मूंछें हैं। दूसरों पे साइकल चढ़ाते हुए शरम नहीं आती क्या? अपुन ने भी लास्ट में फिल्मी स्टाइल में क्लाइमैक्स किया- मैडम, अपुन की मूंछों में ब्रेक थोड़ी लगे हैं! साइकल का अपुन की मूंछों से क्या लेना-देना?

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2008

भैया के पीछू दो-दो भाई

नमिता जोशी
सर्किट गली के कुत्ते के माफिक भाग-भाग के आया और अपुन से बाजू वाले कल्लन की खोली में चलने कू बोला। पर - क्यों, वाय, काइकू?? अपुन ने पूछा तो हिंदी फिल्मों का डायलॉग मारने लगा - मुन्ना भाई हर क्यों, वाय और काइकू का जवाब नहीं होता। इमरजेंसी में कल्लन तुमकू बुला रयेला है। अपुन सर्किट के साथ कल्लन की खोली में पौंचा तो क्या देखता कल्लन का छोकरा लल्लन भैया पैकिंग कर रयेला था। कल्लन ने अपुन कू देखतेइच बोला - अच्छा हुआ मुन्ना भाई, तुम इदर आ गये। अब तुम इसको समझाओ। ये मुंबई जाने के लिए पैकिंग कर रहा है।
अपुन ने लल्लन भैये से पूछा- काइकू अपने बूढ़े बाप कू हार्ट अटैक दे रयेला है?? वो बोला - मुन्ना भाई, अब मुझे गॉड भी नहीं रोक सकता हीरो बनने से। मैं मुंबई जा रहा हूं। फटे हुए जूते की तरह अपनी किस्मत का मुंह भी खुल रहा है। अब तुम बदबू वाला मोजा बनकर इसका ढक्कन बंद मत करो। सर्किट कू लल्लन भैये का ये डायलॉग सुनके दिल पे जोर की लगी और बोला - अबे, तू मुन्ना भाई कू बदबू वाला मोजा बोल रयेला है! तेरे भेजे की घास कू घोड़ा खा के चला गया है क्या?? अपुन ने सर्किट कू चुप कराके लल्लन कू बताया - देख लल्लन, तू अभी देश के किसी भी कोने में चला जा, पन मुंबई का सपना थोड़े दिन के वास्ते देखना छोड़ दे। तेरे कू मालूम नहीं, वहां सब मराठी भाई लोग भैया लोग के पीछू पड़ गयेले है। एक भाई मारपीट करवा रयेला है और दूसरा भाई भैया लोग कू मुंबई से पार्सल करने की शपथ खाके बैठेला है। वइसे भी तू उदर किसके घर में रहेंगा। कोई अरेंजमेंट कियेला है क्या??
लल्लन लपक के बोला - मेरा दोस्त है छोटे लाल। उसका फोन आया था। वो मेरे को उदर सेटल कर देगा। पहले छोटी-मोटी नौकरी दिलाएगा और बाद में फिल्मी स्टूडियो में जुगाड़ से एंटर करवा देगा। उसके बाद मैं और मेरा टैलेंट। अबे लल्लन, तेरे बाप ने तेरा नाम एकदम फिट रखेला है - लल्लन बोले तो लल्लू। तेरेकू मालूम नहीं, उदर के भाई लोग सिर्फ मराठी मानूस कू इच प्यार करते है। वो भाई जब बिग बी तक कू नहीं छोड़ रयेला है तो तेरेकू उदर कइसे काम करने देगा?? तेरे जइसे कू तो पहली नजर में पार्सल कर देंगे। वइसे भी मराठी भाषा आना मांगता है तेरेकू। तेरे बोलने का इश्टाइल नहीं चलेंगा उदर।
लल्लन के सिर पे तो मुंबई जाने का भूत सवार था। बोला - मुन्ना भाई, उसका इलाज भी है मेरे पास। जइसे विदेश का नागरिक बनने के लिए इंडियन लोग अंग्रेजी मेम से शादी करते हैं न, मैं भी वैसा ही करूंगा। मराठी छोरी से मैं भी शादी बनाउंगा और फिर उससे मराठी सीख के मराठी मानूस बन जाउंगा। गरम चाय में बिस्कुट के माफिक पिघल के मिल जाउंगा मुंबई में। वेरी सिंपल! लल्लन भैये का कॉन्फिडेंस देखके अपुन सर्किट के साथ कल्लन की खोली से बाहर आ गया। वइसे भी इंडिया आजाद है, उसमें किसी कू किदर भी जाने से रोकने वाला अपुन कौन होता है।
देखना तो ये है कि इस फाइट में जीत किसकी होती है भाई लोग की या भैया लोग की।

मैजिकल रिमोट

नमिता जोशी
एक चैनल में मैच और दूसरे चैनल में मुंबई का दंगा...अपुन कू आमची मुंबई में हो रयेले बवाल की न्यूज देखनी थी और सर्किट कू मैच। विनर सर्किट निकला, बोले तो मैच देख-देख कू क्रिकेट खेलना आया या नहीं, ये तो मालूम नहीं, पन अपुन से रिमोट की लड़ाई में हर बार विनर वोइच होता है। ठाकरे की सेना ने अपुन के फेवरेट हीरो बिग बी के घर तक कू नहीं छोड़ा और इस येड़े सर्किट कू सड़ेले इंडिया-श्रीलंका मैच की पड़ेली थी। खुन्नस में आके अपुन ने सर्किट कू अक्खा वर्ल्ड की गालियां दे डालीं।

काश! अपुन के पास दो रिमोट होते या फिर दो टीवी...। नहीं, रिमोट तो अइसा होता, जिससे अपुन इस सर्किट का भेजा फ्राई कर डालता। इसका उठना-बैठना सब अपुन के उस रिमोट के बटन पर डिपेंड होता। एक बटन दबाके सर्किट की कचर कचर पॉज कर देता। जास्ती पंगा करता तो फास्ट फॉरवर्ड में डाल देता। बोरिंग मैच देखके अपुन कल्लू कबाड़ी की भंगार की दुकान पे चला गया। उदर, जइसे अपुन का सपना सच हो गया। कल्लू कबाड़ी से अपुन ने दिल की बात बोली तो उसने गॉड के माफिक अपुन के हाथ में एक रिमोट टिका दिया। बोला, ये ट्राई करके देखो। अपुन वो रिमोट लेके खोली पे वापस आ
ट्रायल करने के वास्ते अपुन ने सबसे पहले तो पॉज का बटन दबाया और सर्किट की टेप के माफिक चलती बकवास कू उदर का उदर इच रोक दिया। मैजिक काम कर गया। सर्किट पॉज हुआ तो अपुन ने टीवी का रिमोट झटका और अपना फेवरेट न्यूज चैनल जी भरके देखा। लंच टाइम पे अपुन कू भूख लगी तो सर्किट कू देखके दया आ गई। प्ले का बटन दबातेइच उसकी बकवास चालू। अपुन कू इस बार उसकी बकवास सुनके बिल्कुल बुरा नहीं लगा। रिमोट जो आ गयेला था अपुन के पास। ही..ही..। इदर लंच खल्लास उदर सर्किट की बकवास खल्लास। स्लीप का बटन दबाके उसकू स्लीप में डाल दिया और अपुन फिर से बैठ गया टीवी के आगे।

मैजिकल रिमोट मिलते इच अपुन की तो खुशी का ठिकाना इच नहीं था। अब दिल में आया कि सर्किट कू फास्ट फॉरवर्ड में भेजूं तो कइसा रहेंगा? आइडिया बुरा नहीं था अपुन का, आई शप्पथ। इसकू थोड़े दिन आगे भेजकू देखता है कि इसका फ्यूचर में क्या लिखेला है गॉड। हाइला, ये अपुन से क्या हो गयेला है? अपुन ने क्या देखा, सर्किट मुंबई में है और वो भी मुंबई का किंग, बोले तो सबसे बड़ा डॉन! बात इदर इच खल्लास नहीं हुई। उसके बाजू में वो कौन खड़ेला है? अरे ये तो अपुन है। पन ये सर्किट अपुन कू काइकू हड़का रयेला है? नहीं............! ये नहीं हो सकता! सर्किट अपुन का बाजा बजा रयेला है! अपुन का चिरकुट अपुन के इच सर पे बैठ के अपुन की पुंगी बजाने वाला है फ्यूचर में।

इतना खतरनाक फ्यूचर देखकू अपुन ने जल्दी से बटन दबाया और वापस आज में आया। रिमोट फेंका और जल्दी से सर्किट कू डॉन बनने से रोकने का आइडिया सोचने लगा। भेजे की बत्ती जली तो समझ में आया कि मुन्ना इस सर्किट से पंगा नहीं लेने का, नहीं तो ये फ्यूचर में तेरी पुंगी बजाएगा। बस, आइडिया आते इच अपुन ने टीवी का रिमोट उसके हाथ में थमाया और सोने चला गया।

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2008

फोकट की दावत, अपुन की आफत

जब से शादी का सीजन खुलेला है, सर्किट येड़ा हो गयेला है। अक्खा दिन पेट में पट्टी बांध के बस्ती में घूमता है, फास्ट रखता है और सूरज चाचू के ढलते इच भाड़े का ढिनचैक सूट पहन कू रेडी हो जाता है। बस्ती में किसी से जेपी हो या ना हो, जेपी बोले तो जान-पहचान, बस कुत्ते के पट्टे के माफिक गले में लाल कलर का टाई बांध के पौंच जाता है बारात में। फोकट की दावत मिलती है तो अइसे दबाता जइसे कल से इसकू जंतर मंतर के आगे आमरण अनशन पे बैठने का हो। खोली पे लौट के आता है तो चिरकुट के कपड़े भी खाने की बास मारते हैं। वइसे ईमान से बोलेगा तो कभी-कभी वो बास अपुन की नाक में पड़ती है तो मालूम इच नहीं चलता कि कब अपुन की जीभ कुत्ते के माफिक बाहर आ गयेली है। कल तो सर्किट की ऐश हो गयेली थी। दिन में भी एक बारात में बाजा बजाने के वास्ते गया और रात में भी किसी दुल्हन की विदाई का बीन बजाने गयेला था। अपुन का दिल भट्टी के माफिक जल रयेला था। दिल पे पत्थर रखके अपुन ने टाइम पास करने के वास्ते टीवी का बटन दबा दिया। अक्खा दिन बर्ड फ्लू की न्यूज देख-देख के अमरूद के माफिक अइसा पका कि अभी टपका, तभी टपका। टीवी देखते देखते रात भी हो गई और अपुन की आंख कब लग गई पता इच नहीं चला। सोचो, अपुन का बैड लक कित्ता खराब है। न तो कोई अपुन कू शादी में बुलाता और ना सर्किट के माफिक किसी भी शादी में घुसके खाने की अपुन की हिम्मत पड़ती है। खाने के बारे में सोच-सोच के अपुन सो गया और वो भी बिना डिनर खाए। रात कू सर्किट ने खोली का दरवाजा इत्ती फोर्स से नॉक किया कि अपुन ड्रीम सीक्वेंस से बाहर आ गया। टेस्टी खाने का सपना कांच के माफिक टूटा तो अपुन का भेजा घूमा। बाहर देखा तो सर्किट खा-पी के टल्ली हो के आयेला था और अक्खा ताकत खोली के कच्चे दरवाजे पे ट्राई कर रयेला था। खुन्नस में अपुन ने उसका नशा धुएं के माफिक उड़ाने का सोचा। इदर अपुन के पेट से कुकड़कू की साउंड आ रयेली थी और वो हटेला सर्किट अंदर आके मुर्गे के मफिक पंख फडफड़ाते हुए कुकड़ू कू करने लगा। बोला - मुन्ना भाई, कल से तुम अपुन के साथ शादी में आना स्टार्ट कर दो। आज अपुन ने फोकट के चार-पांच मुर्गे हलाल कर डाले, मालूम? मुर्गे का नाम सुनते इच अपुन कू बर्ड फ्लू वाली न्यूज याद आई और अपुन ने फोकट में उसकू डरा दिया। ओए सर्किट, तू मुर्गे हड़प के आयेला है? अब तेरेकू गॉड भी नहीं बचा सकता है। तेरे कू मालूम नहीं है कि आजकल बर्ड फ्लू फैल रयेला है? अपुन की बात सुनके सर्किट अकड़ के बोला - भाई तुम खाली-पीली काइकू रायता फैला रयेला है? अपुन ने भी टीवी देखेला था। तुम्हारी नॉलेज अप-टु-डेट नहीं है। बर्ड फ्लू पकेला मुर्गा खाने से नहीं फैल रयेला है। अपुन कू खाता-पीता देखके तुम्हारा दिल जल रयेला है और अक्खा खोली में उसकी बास आ रयेली है। अपुन कू क्या मालूम था कि तुमकू मुर्गे से प्रॉब्लम है। अपुन तुम्हारे वास्ते पॉकेट में रोस्टेड मुर्गा छिपा के लायेला था। पन अभी लगता है, ये अपुन कू इच खाना पड़ेंगा। अइसा बोल के सर्किट फिर चपर-चपर चालू हो गया और अपुन की जीभ कुत्ते के माफिक कब बाहर आ गई, मालूम इच नहीं चला।