रविवार, 24 फ़रवरी 2008

अपुन की मूंछों में ब्रेक थोड़ी लगे हैं!

नमिता जोशी
सर्किट फटेले टायर के माफिक मुंह लटका के खोली में एंटर किया। अपुन ने क्या हुआ पूछने के वास्ते मुंह खोला भी नहीं था कि वो पहले इच बताने लगा- मुन्ना भाई अपुन अभी रोड पे मस्त हाथी के माफिक घूम रयेला था। तभीच वो कल्लू कचरा छुट्टे सांड के माफिक अपनी नई साइकल पे आता हुआ दिखा। नई साइकल का ना उसकी आंखों में रे बैन के गॉगल के माफिक चढे़ला था। बस उसी ने अपनी साइकल अपुन पे चढ़ा दी। अपुन ने उससे बोला- रोड पे चलने वाले आदमी का नहीं तो कम से कम अपनी साइकल का तो सोच। पहले घंटी नहीं मार सकता था क्या! वो बोला- इत्ती बड़ी साइकल मार दी अपुन ने तेरेकू, छोटी सी घंटी मारके क्या होता?

सर्किट और साइकल की ट्रैजिडी सुनके हनीफ हटेला भी चालू हो गया। बोला- अरे, मुन्नाभाई ये तो कुछ भी नहीं है। कल अपुन का साइकल के साथ इससे भी सॉलिड एनकाउंटर हुआ था। बोले तो वो छोकरी साइकल सीख रयेली थी। अपुन जा रयेला था काम से। अचानक अपनी साइकल लेकर अपुन के पैर पे चढ़ गई। दिल में तो आया कि दो-तीन घूंसे पिन्हा दूं, पन लड़की समझ कू अपुन ने उसकू माफ कर दिया। गुस्से में इत्ता इच बोला कि तू अपुन के पैर कू साइकल स्टैंड समझेली है क्या, जो पार्किंग करने के वास्ते आंख बंद करके चढ़ा दी? वो छोकरी गुस्से में साइकल पकड़ के चली गई। पन अभी तो ये अपुन की एनकाउंटर स्टोरी का इंटरवल था।

शाम कू क्लाइमैक्स अइसे हुआ कि अपुन साइकल पे जा रयेला था कि मालूम नहीं वो किदर से अपुन के सामने आ गई। साइकल एकदम वोइच स्टाइल में उसके पैरों पे रुकी, जइसे सुबह उसने अपुन के पैरों पे चढ़ाई थी। एक सेकंड के वास्ते तो लगा गॉड ने अपुन कू उससे बदला लेने का गोल्डन चांस दे दिया। अचानक वो फुल वॉल्यूम में टीवी सीरियल की वैम्प के माफिक दहाड़ी - इत्ता बड़ा हो गया, इत्ती मोटी-मोटी मूंछें हैं। दूसरों पे साइकल चढ़ाते हुए शरम नहीं आती क्या? अपुन ने भी लास्ट में फिल्मी स्टाइल में क्लाइमैक्स किया- मैडम, अपुन की मूंछों में ब्रेक थोड़ी लगे हैं! साइकल का अपुन की मूंछों से क्या लेना-देना?

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