शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2008

फोकट की दावत, अपुन की आफत

जब से शादी का सीजन खुलेला है, सर्किट येड़ा हो गयेला है। अक्खा दिन पेट में पट्टी बांध के बस्ती में घूमता है, फास्ट रखता है और सूरज चाचू के ढलते इच भाड़े का ढिनचैक सूट पहन कू रेडी हो जाता है। बस्ती में किसी से जेपी हो या ना हो, जेपी बोले तो जान-पहचान, बस कुत्ते के पट्टे के माफिक गले में लाल कलर का टाई बांध के पौंच जाता है बारात में। फोकट की दावत मिलती है तो अइसे दबाता जइसे कल से इसकू जंतर मंतर के आगे आमरण अनशन पे बैठने का हो। खोली पे लौट के आता है तो चिरकुट के कपड़े भी खाने की बास मारते हैं। वइसे ईमान से बोलेगा तो कभी-कभी वो बास अपुन की नाक में पड़ती है तो मालूम इच नहीं चलता कि कब अपुन की जीभ कुत्ते के माफिक बाहर आ गयेली है। कल तो सर्किट की ऐश हो गयेली थी। दिन में भी एक बारात में बाजा बजाने के वास्ते गया और रात में भी किसी दुल्हन की विदाई का बीन बजाने गयेला था। अपुन का दिल भट्टी के माफिक जल रयेला था। दिल पे पत्थर रखके अपुन ने टाइम पास करने के वास्ते टीवी का बटन दबा दिया। अक्खा दिन बर्ड फ्लू की न्यूज देख-देख के अमरूद के माफिक अइसा पका कि अभी टपका, तभी टपका। टीवी देखते देखते रात भी हो गई और अपुन की आंख कब लग गई पता इच नहीं चला। सोचो, अपुन का बैड लक कित्ता खराब है। न तो कोई अपुन कू शादी में बुलाता और ना सर्किट के माफिक किसी भी शादी में घुसके खाने की अपुन की हिम्मत पड़ती है। खाने के बारे में सोच-सोच के अपुन सो गया और वो भी बिना डिनर खाए। रात कू सर्किट ने खोली का दरवाजा इत्ती फोर्स से नॉक किया कि अपुन ड्रीम सीक्वेंस से बाहर आ गया। टेस्टी खाने का सपना कांच के माफिक टूटा तो अपुन का भेजा घूमा। बाहर देखा तो सर्किट खा-पी के टल्ली हो के आयेला था और अक्खा ताकत खोली के कच्चे दरवाजे पे ट्राई कर रयेला था। खुन्नस में अपुन ने उसका नशा धुएं के माफिक उड़ाने का सोचा। इदर अपुन के पेट से कुकड़कू की साउंड आ रयेली थी और वो हटेला सर्किट अंदर आके मुर्गे के मफिक पंख फडफड़ाते हुए कुकड़ू कू करने लगा। बोला - मुन्ना भाई, कल से तुम अपुन के साथ शादी में आना स्टार्ट कर दो। आज अपुन ने फोकट के चार-पांच मुर्गे हलाल कर डाले, मालूम? मुर्गे का नाम सुनते इच अपुन कू बर्ड फ्लू वाली न्यूज याद आई और अपुन ने फोकट में उसकू डरा दिया। ओए सर्किट, तू मुर्गे हड़प के आयेला है? अब तेरेकू गॉड भी नहीं बचा सकता है। तेरे कू मालूम नहीं है कि आजकल बर्ड फ्लू फैल रयेला है? अपुन की बात सुनके सर्किट अकड़ के बोला - भाई तुम खाली-पीली काइकू रायता फैला रयेला है? अपुन ने भी टीवी देखेला था। तुम्हारी नॉलेज अप-टु-डेट नहीं है। बर्ड फ्लू पकेला मुर्गा खाने से नहीं फैल रयेला है। अपुन कू खाता-पीता देखके तुम्हारा दिल जल रयेला है और अक्खा खोली में उसकी बास आ रयेली है। अपुन कू क्या मालूम था कि तुमकू मुर्गे से प्रॉब्लम है। अपुन तुम्हारे वास्ते पॉकेट में रोस्टेड मुर्गा छिपा के लायेला था। पन अभी लगता है, ये अपुन कू इच खाना पड़ेंगा। अइसा बोल के सर्किट फिर चपर-चपर चालू हो गया और अपुन की जीभ कुत्ते के माफिक कब बाहर आ गई, मालूम इच नहीं चला।

2 टिप्‍पणियां:

राज यादव ने कहा…

बोले तो फर्स्ट टाईम इदर इच आना हुआ भाई .. तेरे कू मालूम नहीं है कि आजकल बर्ड फ्लू फैल रयेला है? अपुन की बात सुनके सर्किट अकड़ के बोला - भाई तुम खाली-पीली काइकू रायता फैला रयेला है? अपुन ने भी टीवी देखेला था। तुम्हारी नॉलेज अप-टु-डेट नहीं है। बर्ड फ्लू पकेला मुर्गा खाने से नहीं फैल रयेला है। अपुन कू खाता-पीता देखके तुम्हारा दिल जल रयेला है और अक्खा खोली में उसकी बास आ रयेली है। ...ये लाइन मस्त लगी ..बधाई
कभी हमारे ब्लॉग पर भी तस्रीफ लाये .

अजित वडनेरकर ने कहा…

जहां तक मुझे याद आ रहा है सन् 2003 में एक महिने के लिए तुम मुंबई गए थे। उसके बाद फिर गए नहीं। गए तो इतने रहे नहीं कि टपोरी ज़बान बोलने लगो। फिर ये क्या माजरा है भाई....
झक्कास है। जमाए रखो । बोले तो...