मंगलवार, 2 अक्टूबर 2007

नो भाईगीरी ओनली गांधीगीरी।

अपुन खाट पे खटमल के माफिक चिपक के लेटेला था। तभीच खोली के दरवाजे कू किसी ने डंडे से पीटा, एकदम अपुन के मकान मालिक के इश्टाइल में। पन खोली का भाड़ा तो अपुन ने कल इच दे डाला है। फिर सुबह सुबह कौन? अरे बापू! गांधी बापू पांच सौ के नोट में से निकल के अपुन की खोली में किदर से आया? बापू बोले - मुन्ना ये सवाल तो मुझे करना चाहिए। तू मुंबई छोड़ के दिल्ली क्यों आया। तुझसे तो मेरी मुलाकात मुंबई में हुई थी ना? अपुन बोला - बापू तुम बात तो एकदम ठीक कर रयेला है पन दिल्ली तो दिल्ली है। मालूम है, अपुन ने पेपर में पढ़ेला था कि दिल्ली अक्खा देश की नंबर वन सिटी है। इसका वास्ते अपुन और सर्किट मुंबई छोड़के दिल्ली में इच जम गयेले हैं। बोले तो अब ये दिल्ली तुम्हारे टाइम की दिल्ली नहीं है रे। उस टाइम तो क्या, ये दिल्ली में तो रोज रोज चेंज आ रयेले हैं। तुम इच बोलो, मुंबई में तो मालूम नहीं कित्ते सालों से बड़ी बड़ी बिल्डिंग हैं, उसके आगे भोत कम स्कोप है। पन दिल्ली में रोज नई बिल्डिंग, रोज नया फ्लाईओवर और रोज नया मॉल खुल रयेला है। बोले तो मुंबई से साइज में बड़ी है न। और एक टॉप सीक्रेट बात बताता है। अपुन जइसे लुक्खे लोग के वास्ते इदर स्कोप जास्ती है। उदर भाईगीरी करने वाले भोत शाणे हैं पन इदर अपुन का राज चलता है। ओ सॉरी बापू, भाईगीरी से अपुन कू तुम्हारी सिखाई गांधीगीरी याद आ गयेली है। अरे हां, तुमकू मालूम है बापू, गांधीगीरी के वास्ते तो ये जगह एकदम परफेक्ट है। बापू ने अपुन से पूछा - क्यों, यहां क्या वो लोग ज्यादा रहते है, वो, वो तुम्हारी भाषा में मामू लोग, जिन्हें ठीक करने के लिए गांधीगीरी की जरूरत पड़ती है। अपुन ने बापू कू बताया - नहीं रे बापू, अइसा नहीं है। मामू टाइप का आदमी तो अपुन कू अक्खा देश में कहीं भी मिल जाएगा। अपुन बात कर रयेला है गांधीगीरी के कोर्स की। इदर डीयू में गांधीगीरी पढ़ाने के वास्ते अक्खा कोर्स बनाएला है। भोत सारे स्टूडेंट लोग ने एडमिशन लियेला है उसमें। बोले तो गांधीगीरी कू भेजे में अच्छी तरह घुसाने के वास्ते स्टूडेंट लोग तुम्हारे गांव भी जाते हैं। अपुन की बात सुनके बापू भोत खुश हुआ फिर अपुन से बोला - लेकिन तुमने तो यहां आकर फिर से भाईगीरी शुरू कर दी है। अपुन ने समझाया - बापू, वो जिस दिन से तुम अपुन कू छोड़के गया है न, अपुन भोत टेंशन में था। अक्खा वर्ल्ड की पब्लिक अपुन कू पागल बोलने लगी थी। तुम तो अपुन से अइसा रूठा जइसे सावन रूठ के चला जाता है। और तब से अपुन की हालत किसान के माफिक हो गई थी, जिसके खेत सूख रयेले थे। और तो और अपुन के पर्स में एक गांधी का नोट तलक नहीं था। धंधा चौपट हो गया तो अपुन तुमकू ढूंढने के वास्ते दिल्ली आ गया। भोत दिन तक तुम्हारा वेट किया। तुम नहीं आया तो धंधा स्टार्ट किया। नोट आने लगे और नोट के अंदर तुम्हारा दर्शन भी हो गया। सब कुछ तुमकू पाने के वास्ते इच तो किया अपुन। अपुन का बहाना बापू कू पसंद नहीं आया और वो गायब हो गया। अपुन जोर से चिल्लाया - बापू, बापू सॉरी बोलताय अपुन। आगे से भाईगीरी नहीं, सिर्फ गांधीगीरी, आई शप्पथ। तभीच किसी ने जोर से खोली का दरवाजा ठोका और अंदर आ गया। अपुन ने आंख खोली तो सच्ची मुच्ची का लैंडलॉर्ड आयेला था, खोली का भाड़ा मांगने के वास्ते। अपुन ने उसकू बोला कि कल इच तो सर्किट के हाथ से चार करारे गांधी के नोट भेजेले थे। वो बोला - तू और तेरा सर्किट, कहीं दारूबाजी में उड़ा दिए होंगे। मुझे तो अभी दे नोट चार करारे गांधी बापू वाले। अपुन के दिल में तो आया कि उसकू एक कान के नीचे पिन्हा दूं पन फिर सपने में बापू से किया प्रॉमिस याद आ गया। नो भाईगीरी ओनली गांधीगीरी।

कोई टिप्पणी नहीं: