मंगलवार, 9 अक्टूबर 2007

फोकट का अडवाइस

अपुन और अपुन की चारपाई...फीवर चढ़ता है तो अक्सर एक इच बात सोचते हैं। लाइफ में सोशल सर्कल जास्ती बड़ा नहीं होना चाहिए। बोले तो इदर तबियत डाउन, उधर अक्खा गैंग एक्टिव। सब के सब अपने भेजे की धूल कू झाड़-पोछ के सामने आ जाते हैं एक अडवाइस लेके। ये खाने का, वो नहीं खाने का...चलो इदर तलक बात हो तो चलता है। पन बस्ती के एक येड़े राजू कबाड़ी के बारे में अपुन तुमकू क्या बताए। इत्ता भंगार तो उसकी दुकान में भी नहीं है, जित्ता उसके भेजे में सड़ रयेला है। बोले तो, अडवाइस देने के लिए मुंह खोलता है तो अइसी अइसी मनहूस बातें मुंह से उगलता है जइसे बाजू की बस्ती का कूड़ेदान अक्खा टाइम बास उगलता है। ये कर ले, नहीं तो खाट पे लंबा पड़ जाएंगा, वो कर ले नहीं तो हाथ काटना पड़ेंगा... बोले तो उसकू इत्ती बार बोला, मामू गॉड ने तेरे कू अच्छी शकल नहीं दी तो कम से कम इस सड़ेले थोबड़े से बातें तो शुभ शुभ करना मांगता है। पन वो तो अइसा कसम खाके पैदा हुआ था कि जब भी मुंह खोलेगा तो मनहूस बोल बचन इच निकालेंगा। एक और शाणा है बस्ती में। टीवी पे ऐड देखके एक फोन लियेला है फोकट का। दिन और रात उसके वास्ते बरोबर है। येड़ा कभी भी अपुन का नंबर घुमा देता है। अपुन कू तो लगता है कि कंपनी ने उसी के वास्ते फोकट का फोन लॉन्च कियेला है। अपुन पूछता है कि तेरे फोकट के फोन के चक्कर में अपुन अपना कीमती भेजा काइकू खपाए। खाली-पीली बीमार आदमी का टाइम खोटी करने वाले से अपुन कू भोत नफरत है। अडवाइस देने से मन भर जाता है तो फिर फोकट के सवाल पूछ-पूछ के भेजा फ्राई करता है। शाणे की हिम्मत तो देखो। अपुन बीमार है, अपुन खोली की खाट पे खटमल के माफिक चिपकेला बैठा है और अपुन से इच बोलता है कि मुन्ना भाई, अपुन तुम से भोत नाराज है। क्या बात है, आजकल फोन नहीं करते हो? इत्ते दिन हो गयेले हैं, एक भी फोन नहीं किया। अरे, अपुन पूछता है कि बीमार अपुन है पन भेजा तेरा खाली हो रयेला है। इत्ता भी नहीं समझता कि बीमार आदमी आराम करेगा या फिर पब्लिक कू फोन घुमाता रहेगा। इस बीमार पे कुछ तो रहम खा। पन ये अडवाइस देने वाले और फोकट के सवाल पूछने वाले रहम किदर से खाएंगे। इनका पेट तो अपुन जइसे लोग का भेजा खाके भरता है न।

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